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तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है!
हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में ईजाद,‘फ़ैज़’ गुलशन में वही तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जाते जाते यूँही!
आते आते यूँही दम भर को रुकी होगी बहार,जाते जाते यूँही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बू-ए-गुल ठहरी न!
दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी,बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिल से निकली है तो!
बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम,दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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झण्डे रह जायँगे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही । जीवित…
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वस्ल की शब थी तो!
वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी,हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वही शीरीं का दहन!
है वही आरिज़*-ए-लैला वही शीरीं का दहन,निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है| *Cheeks फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आज तक शैख़ के!
आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम,अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़