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किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे!
खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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न हम मिसाल-ए-सबा!
न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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तिरी निगाह का जादू!
मुझे नहीं किसी उसलूब-ए-शाइरी की तलाश, तिरी निगाह का जादू मिरे सुख़न में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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मिरे जुनूँ की महक!
तू ऐ बहार-ए-गुरेज़ाँ किसी चमन में रहे, मिरे जुनूँ की महक तेरे पैरहन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल – इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशीआहटों का पता है ख़ामोशी चाँदनी है,…
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हसीनों की अंजुमन में रहे!
हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे, निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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होश में लाए हुए हैं हम!
छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी, फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी
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फिर सर किसी के दर पे!
फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम, पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी
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मिरे सब गुनाह बख़्श दिए!
मिरे ख़ुदा ने मिरे सब गुनाह बख़्श दिए, किसी का रात को यूँ मैं ने इंतिज़ार किया| जोश मलीहाबादी
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हम ने ए’तिबार किया!
सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का, जब उस ने वअ‘दा किया हम ने ए’तिबार किया| जोश मलीहाबादी