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रात क़याम करो!
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो, ‘इंशा’-जी हम पास भी लेकिन रात की रात क़याम करो| इब्न-ए-इंशा
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छपने अख़बार के बीच
मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे, नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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शहर-ए-निगार!
ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो, नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार* के बीच| *CityOfBeauty इब्न-ए-इंशा
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भरी बहार के बीच!
पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस, आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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देखो कि!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य में अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता – रात कोदिन कोअकेले में और मेले में तुमगुनगुनाते…
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तुम बाज़ार के बीच!
दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच, ‘इंशा’ जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच| इब्न-ए-इंशा
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गले से लगाऊँ मैं!
उस जैसा नाम रख के अगर आए मौत भी, हँस कर उसे ‘क़तील’ गले से लगाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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बदनाम मेरे क़त्ल से!
बदनाम मेरे क़त्ल से तन्हा तू ही न हो, ला अपनी मोहर भी सर-ए-महज़र लगाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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तुझे आज़माऊँ मैं!
इक शब भी वस्ल की न मिरा साथ दे सकी, अहद-ए-फ़िराक़ आ कि तुझे आज़माऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई