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परछाइयों के चलने का
यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार
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बहुरूपिया!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यासकार और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – दुनिया दूषती हैहँसती हैउँगलियाँ उठा कहती है …कहकहे कसती है –राम…
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फिर सोचें वो बातें!
बैठ जाएँ साया-ए-दामान-ए-अहमद में ‘मुनीर’, और फिर सोचें वो बातें जिन को होना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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मिट्टी में सोना है अभी!
हम ने खिलते देखना है फिर ख़याबान-ए-बहार, शहर के अतराफ़* की मिट्टी में सोना है अभी| *आसपास मुनीर नियाज़ी
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दिल से धोना है अभी!
जो हुआ होना ही था सो हो गया है दोस्तो, दाग़ इस अहद-ए-सितम का दिल से धोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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यादों में खोना है अभी!
ऐसी यादों में घिरे हैं जिन से कुछ हासिल नहीं, और कितना वक़्त उन यादों में खोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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इक खिलौना है अभी!
क्यूँ दिया दिल उस बुत-ए-कमसिन को ऐसे वक़्त में, दिल सी शय जिस के लिए बस इक खिलौना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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ख़्वाब बोना है अभी!
रात इतनी जा चुकी है और सोना है अभी, इस नगर में इक ख़ुशी का ख़्वाब बोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए, दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी