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शहर पर ये ज़ुल्म!
शहर को बरबाद कर के रख दिया उस ने ‘मुनीर‘, शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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मुझे इस शहर में!
शहर में वो मो‘तबर मेरी गवाही से हुआ, फिर मुझे इस शहर में ना–मो‘तबर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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मुझको सीधे रास्ते से
राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए, मुझ को सीधे रास्ते से दर–ब–दर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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पीलिया सैलाब!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत- सीप -शंखों तक हमें भी ले चलेंगेपीलिया सैलाब में बहते हुए दिन टूटती…
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पर मुझे इस मुल्क में
मैं बहुत कमज़ोर था इस मुल्क में हिजरत के बा‘द, पर मुझे इस मुल्क में कमज़ोर–तर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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उम्र मेरी थी मगर!
मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर* उस ने किया, उम्र मेरी थी मगर उस को बसर उस ने किया| *निष्फल मुनीर नियाज़ी
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तबीअ’त नहीं मिली!
कुछ दिन के बा‘द उस से जुदा हो गए ‘मुनीर‘, उस बेवफ़ा से अपनी तबीअ‘त नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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मोहलत नहीं मिली!
कहना था जिस को उस से किसी वक़्त में मुझे, इस बात के कलाम की मोहलत नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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अब तक हैं इस गुमाँ में
अब तक हैं इस गुमाँ में कि हम भी हैं दहर* में, इस वहम से नजात की सूरत नहीं मिली| *दुनिया मुनीर नियाज़ी