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दस देहों की गंध!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि श्री अनूप अशेष जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अनूप जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी की यह कविता- दो कमरे का घरदस देहों की गंधऔर तुमहर कोने में। हर बासी सुबहोंबासी ख़बरों…
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फेरे कभी-कभी के!
भूली-बिसरी यादों के ओ जोगी आते रहियो,जी हल्का कर जाते तेरे फेरे कभी-कभी के| सूर्यभानु गुप्त
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मन्दिर, मसजिद, नेता!
हैज़ा, टी. बी.,चेचक से मरती थी पहले दुनिया,मन्दिर, मसजिद, नेता, कुरसी हैं ये रोग अभी के| सूर्यभानु गुप्त
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बँधुआ मज़दूरों से अब!
सारी उम्र छुड़ाते गुज़रे महाजनों से – चेहरे,बँधुआ मज़दूरों से अब तो जीवन हुये सभी के| सूर्यभानु गुप्त
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पत्थर किसी नदी के!
किस को मन के घाव दिखायें हाल सुनायें जी के,इन्सानों से ज़ियादा अच्छे पत्थर किसी नदी के| सूर्यभानु गुप्त