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सिर्फ़ रंग-ओ-बू नहीं!
बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़, तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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हम को अज़ीज़ इश्क़!
अक़्ल-ए-मआश ओ हिकमत-ए-दुनिया के बावजूद, हम को अज़ीज़ इश्क़ का दीवाना-पन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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भारी-भारी तोपें हैं!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – ऑफिस केदरवाजों परकौन कह…
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अक्स-ए-बदन भी है!
माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है, पर इस में कुछ करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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फ़ख़्र करते थे कभी!
अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें, फ़ख़्र करते थे कभी जिन की मुलाक़ातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर
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हँस दिया करते थे!
ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें, हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर
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मुफ़्त का इल्ज़ाम!
कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं, मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते हैं बरसातों पे हम| जाँ निसार अख़्तर