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अब कहाँ मुझ में!
अब समझने लगा हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ*,अब कहाँ मुझ में वो जुनूँ साहब| *Profit and Loss जावेद अख़्तर
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कल और आज !
आज एक बार फिर मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नागार्जुन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बाबा नागार्जुन जी की यह कविता – अभी कल तकगालियॉं देती तुम्हेंहताश खेतिहर,अभी कल तकधूल में नहाते थेगोरैयों के झुंड,अभी कल तकपथराई हुई…
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याद हो कि न याद हो!
कहीं तुम को जाना हुआ अगर न गए बग़ैर ‘नज़ीर’ के,वो ज़माना अपने ‘नज़ीर’ का तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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हाथ में जो शराब ली!
कभी हाथ में जो शराब ली वहीं तुम ने छीन के फेंक दी,मुझे याद है मिरे पारसा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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हाथ में यही हाथ था!
मिरे शाने पर यही ज़ुल्फ़ थी जो है आज मुझ से खिंची खिंची,मिरे हाथ में यही हाथ था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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चंद क़तरा-ए-अश्क!
तुम्हें चंद क़तरा-ए-अश्क भी किए पेश जिस के जवाब में,वो सलाम नीची निगाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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टूटे साज़ की वो सदा!
मिरी बेबसी ने ज़बान तक जिसे ला के तुम को रुला दिया,मिरे टूटे साज़ की वो सदा तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी
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फिर भी उदास था!
मिरी बे-क़रारियाँ देख कर मुझे तुम ने दी थीं तसल्लियाँ,मिरा चेहरा फिर भी उदास था तुम्हें याद हो कि न याद हो| नज़ीर बनारसी