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साहू ने गिरवी रख ली!
तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी,साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की| गुलज़ार
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रेत कभी तन्हाई की!
आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं,क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की| गुलज़ार
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काल-कुएँ में गूँजती!
नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है,काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की| गुलज़ार
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तिनका तिनका काँटे!
तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की,क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की| गुलज़ार
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सुंदरियो!
आज एक बार फिर मैं विख्यात आंचलिक उपन्यास एवं कहानी लेखक और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – सुंदरियो-यो-योहो-होअपनी-अपनी छातियों परदुद्धी फूल के झुके…