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अब हमें तेरी गली!
हम ने हर गाम पे सज्दों के जलाए हैं चराग़,अब हमें तेरी गली राहगुज़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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सर से पा तक वो!
मौज-ए-गुल मौज-ए-सबा मौज-ए-सहर लगती है,सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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उस दिन खुला ये राज़!
बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़,तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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तू जान-ए-अंजुमन!
मुतरिब भी तू नदीम भी तू साक़िया भी तू,तू जान-ए-अंजुमन ही नहीं अंजुमन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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दीवाना-पन भी है!
अक़्ल-ए-मआश ओ हिकमत-ए-दुनिया के बावजूद,हम को अज़ीज़ इश्क़ का दीवाना-पन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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इस में कुछ करिश्मा!
माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है,पर इस में कुछ करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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गीतों का बादल!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के विख्यात गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – मैं गीत बरसाने वाला बादल हूँ ।प्यासे नयनों में हँसता काजल…