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ज़िंदगी की बरात!
भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात,कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा| अली सरदार जाफ़री
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ये एक पल है उसे!
अदम हयात से पहले अदम हयात के बा’द,ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा| अली सरदार जाफ़री
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कँवल खिलाता जा!
अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा,चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा| अली सरदार जाफ़री
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क़ैद हो कर और भी!
क़ैद हो कर और भी ज़िंदाँ में उड़ता है ख़याल,रक़्स ज़ंजीरों में भी करते हैं आज़ादाना हम| अली सरदार जाफ़री
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यह वह भारतवर्ष नहीं है!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि एवं राजनेता श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह कविता – कभी कभी सोचा करता हूँ, मैं ये मन ही मन में,क्यों फूलों…
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मिटते मिटते दे गए!
मिटते मिटते दे गए हम ज़िंदगी को रंग-ओ-नूर,रफ़्ता रफ़्ता बन गए इस अहद का अफ़्साना हम| अली सरदार जाफ़री
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राह में फ़ौजों के पहरे!
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव,आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम| अली सरदार जाफ़री
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दोश पर अपने लिए!
क्या बला जब्र-ए-असीरी है कि आज़ादी में भी,दोश पर अपने लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम| अली सरदार जाफ़री
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गुलज़ार हर वीराना!
ख़ून-ए-दिल से चश्म-ए-तर तक चश्म-ए-तर से ता-ब-ख़ाक,कर गए आख़िर गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम| अली सरदार जाफ़री