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मैं देख चुका हूँ तुझमें!
मेरा दावा है कि तू ने भी न देखे होंगे,ऐसे जल्वे कि जो मैं देख चुका हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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तू वो दरिया है कि!
तू वो दरिया है कि जिस का कोई साहिल ही नहीं,मैं सफ़ीने की तरह डूब गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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इक फूल की मानिंद!
तू ने अब तक मुझे काँटों के सिवा कुछ न दिया,मैं तो इक फूल की मानिंद खिला हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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देख रहा हूँ तुझ में!
बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में,ऐ जफ़ा-दोस्त ये क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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सृजन के क्षण!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| आपकी कविताएं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में भी शामिल की गई थीं| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – रात मीठी…
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दास्ताँ सुनाता जा!
बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास,कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा| अली सरदार जाफ़री
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नक़ाब उठाता जा!
दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना,नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा| अली सरदार जाफ़री
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बला से बज़्म में गर!
बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है,नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा| अली सरदार जाफ़री
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दूर शौक़ की मंज़िल!
रह-ए-दराज़ है और दूर शौक़ की मंज़िल,गराँ है मरहला-ए-उम्र गीत गाता जा| अली सरदार जाफ़री
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गुलों को छेड़ के!
गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार*,गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा| *Like Cool Winds Of Dawn अली सरदार जाफ़री