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पा-ए-नाज़ुक तो !
उन के क़दमों पे न रख सर के है ये बे-अदबी,पा-ए-नाज़ुक तो सर-आँखों पे लिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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मय भी पी जाती है!
नश्शा दोनों में है साक़ी मुझे ग़म दे के शराब,मय भी पी जाती है आँसू भी पिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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रौशनी कितने अँधेरों!
हम हैं एक शम्अ’ मगर देख के बुझते बुझते,रौशनी कितने अँधेरों को दिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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ये सज़ा कम तो नहीं!
क्यूँ हमें मौत के पैग़ाम दिए जाते हैं,ये सज़ा कम तो नहीं है के जिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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मैं बोल रहा हूँ तुझ में!
बेवफ़ा तेरी ज़बाँ पर ये वफ़ा की बातें,ऐसा लगता है कि मैं बोल रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में!
पास इतना कि तिरी साँस से टकराती है साँस,दूर इतना कि तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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टहनी पर फूल जब खिला!
आज एक बार फिर मैं विख्यात नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| | इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – ‘टहनी पर फूल जब खिलाहमसे देखा नहीं गया । एक फूल निवेदित कियागुलदस्ते के हिसाब…
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देख रहा हूँ तुझ में!
तेरे चेहरे से हटाई नहीं जातीं नज़रें,क्या ख़बर देर से क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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भूल गया हूँ तुझ में!
तुझ से बिछड़े तो ज़माना हुआ लेकिन अब तक,याद आता है कि कुछ भूल गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी