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उनको बारात लिखूँ!
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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कसीली बात लिखूँ!
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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मगर न छोड़ेंगे लोग!
वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ,मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा| जावेद अख़्तर
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खुले थे पर तो मिरा!
जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई,खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा| जावेद अख़्तर
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रक्खा हुआ ये अँगारा!
किसी की आँख से टपका था इक अमानत है,मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर
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ख़लिश से छुटकारा!
मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा,वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा जावेद अख़्तर
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मित्रता और पवित्रता!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी में अपने किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता – आडम्बर मेंसमाप्त न होने पाएपवित्रता और समाप्त न…
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मेरे तरफ़-दार से हैं!
जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल,कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं| गुलज़ार
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हम उसी बाज़ार से हैं!
रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं,हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार