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किसलिए इल्ज़ाम!
किस लिए उज़्र-ए-तग़ाफुल किस लिए इल्ज़ाम-ए-इश्क़,आज चर्ख़-ए-तफ़रक़ा-पर्वाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम भी लेना है जिस!
नाम भी लेना है जिस का इक जहान-ए-रंग-ओ-बू,दोस्तो उस नौ-बहार-ए-नाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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इश्क़ रुस्वा हो चला!
इश्क़ रुस्वा हो चला बे-कैफ़ सा बेज़ार सा,आज उस की नर्गिस-ए-ग़म्माज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आदमी होने की पहचान!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना उल्लेखनीय योगदान करने वाले श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – मैं लिखता…
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नाज़ की बातें करो!
हर रग-ए-दिल वज्द में आती रहे दुखती रहे, यूँही उस के जा-ओ-बेजा नाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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सुब्ह होने तक इसी!
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म,सुब्ह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये सुकूत-ए-नाज़ ये!
ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना,ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बे-ख़ुदी बढ़ती चली है!
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो,बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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फ़ासला यूँ कितना है!
एक ही मिट्टी से हम दोनों बने हैं लेकिन,तुझ में और मुझ में मगर फ़ासला यूँ कितना है| शहरयार