Category: Uncategorized
-
तमाशा देखने को!
गए थे शौक़ से हम भी ये दुनिया देखने को,मिला हम को हमारा ही तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली
-
चीख़ों से पुकारों से!
कभी पत्थर के दिल ऐ ‘कैफ़’ पिघले हैं न पिघलेंगे,मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से| कैफ़ भोपाली
-
नववर्ष – चार कविताएं
आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ और श्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की नववर्ष पर लिखी गई चार कविताएं शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविताएं – कल नव वर्ष आने वाला हैआज…
-
रूह की आवाज़!
बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है,कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से| कैफ़ भोपाली
-
गुफाओं से पहाड़ों से!
सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है,गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से| कैफ़ भोपाली
-
उमीदों से भरोसों से !
ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली
-
हमारे ज़ख़्म-ए-दिल!
हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली
-
फूलों से सितारों से!
हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से,शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से| कैफ़ भोपाली