Category: Uncategorized
-
कंगन दिलाने के लिए!
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
मैं नए घर में बहुत!
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
आसमाँ ऐसा भी क्या!
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से, इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
आँसू वन्दनवार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – तुम आए, बोझिल पलकों केआँसू वन्दनवार हो गएरूप-राशि दर्पण भर…
-
इक तबस्सुम जो था!
वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
बच्चा निराले मेरे खेल!
रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
बन गई है मसअला!
मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
-
शहर है अंधा बहुत!
आँख होती तो नज़र आ जाते छाले पाँव के,सच को क्या देखेगा अपना शहर है अंधा बहुत| मंज़र भोपाली
-
रो लिए तन्हा बहुत!
इस से पहले तो कभी एहसास होता ही न था,तुझ से मिल कर सोचते हैं रो लिए तन्हा बहुत| मंज़र भोपाली