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ऐसे सुख़नफ़रोश को!
तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले,ऐसे सुख़न-फ़रोश को मर जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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इल्ज़ाम ये भी चाँद के!
सारा ज्वार-भाटा मिरे दिल में है मगर,इल्ज़ाम ये भी चाँद के सर जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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क्या चल सकेंगे!
क्या चल सकेंगे जिन का फ़क़त मसअला ये है,जाने से पहले रख़्त-ए-सफ़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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कुछ फ़ैसला तो हो !
कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए,पानी को अब तो सर से गुज़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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एक मुश्त-ए-ख़ाक!
एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है,ज़िंदगी की बेबसी का इस्तिआ’रा देखना| परवीन शाकिर
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आइने की आँख ही!
आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए,जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना| परवीन शाकिर
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ख़ून में डूबा हुआ!
जब बनाम-ए-दिल गवाही सर की माँगी जाएगी,ख़ून में डूबा हुआ परचम हमारा देखना| परवीन शाकिर
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भूल जाओ वामन!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवियित्री सुश्री नीलम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नीलम जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री नीलम सिंह जी की यह कविता – नहीं काट सकतेअतल में धँसीमेरी जड़ों कोतुम्हारी नैतिकता केजंग लगे भोथरे हथियार मत आँको मेरा…
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अपना सितारा देखना!
किस शबाहत को लिए आया है दरवाज़े पे चाँद, ऐ शब-ए-हिज्राँ ज़रा अपना सितारा देखना| परवीन शाकिर
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जाते जाते उस का वो!
यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर,जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना| परवीन शाकिर