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ख़ुमार जाता रहा!
किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही, मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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ख़ुलूस तो है मगर!
खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा,ख़ुलूस तो है मगर ए’तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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अगर हो रात लिखूँ!
जाने ये कैसा दौर है जिस में जुरअत भी तो मुश्किल है,दिन हो अगर तो उस को लिखूँ दिन रात अगर हो रात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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फ़िरक़े ज़ात लिखूँ!
अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं,तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौमें फ़िरक़े ज़ात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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इनको जज़्बात लिखूँ!
तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़,लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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कैसे वो सदमात लिखूँ!
किस किस की आँखों में देखे मैं ने ज़हर बुझे ख़ंजर,ख़ुद से भी जो मैं ने छुपाए कैसे वो सदमात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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ग़म नहीं लिक्खूँ क्या!
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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इस घर में!
आज मैं अपने वरिष्ठ कवि मित्र स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – इस घर में घर से ज़्यादा धुआँअँधेरे से ज़्यादा अँधेरादीवार से बड़ी दरार। इस घर…
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किन लफ़्ज़ों में इतनी!
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर