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रामकली!
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कब उसके यौवन की धूप ढलीइतना भी नहीं जाने रामकली। सुबह सवेरे हीउठ जाती हैझाडू-पोंछा खूबलगाती है जब तब खाती डांटखूब पगली। धरम-करम कोखूब मानती हैसारे तिथि-त्योहारजानती है, जो भी करते,करते राम भली। मुद्दत से वोसेवक है घर कीसुख की दुआमांगती हैसबकी यही आस्था है…
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तिरा ग़म सलामत!
सुकूँ ही सुकूँ है ख़ुशी ही ख़ुशी है,तिरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है| ख़ुमार बाराबंकवी