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कौन सा वो जादू है!
कौन सा वो जादू है जिस से ग़म की अँधेरी सर्द गुफा में,लाख निसाई साँस दिलों के रोग मिटाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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फूल चढ़ाने आ जाते!
जिन लोगों ने उन की तलब में सहराओं की धूल उड़ाई,अब ये हसीं उन की क़ब्रों पर फूल चढ़ाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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शाम आते ही आँखों!
दिन भर जो सूरज के डर से गलियों में छुप रहते हैं,शाम आते ही आँखों में वो रंग पुराने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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कैसे कैसे लोग हमारे!
जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं,कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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सितारे शाम से पहले!
न जाने क्यूँ हमें इस दम तुम्हारी याद आती है,जब आँखों में चमकते हैं सितारे शाम से पहले| क़तील शिफ़ाई
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हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!
आज मैं विख्यात गीतकार स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। रंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत– हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!पुराना सब कुछ बुरा न रहा,नया भी सब कुछ नहीं…
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मिरी तक़दीर का तारा!
गिरा है टूट कर शायद मिरी तक़दीर का तारा, कोई आवाज़ आई थी शिकस्त-ए-जाम से पहले| क़तील शिफ़ाई
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कोई गर्दिश नहीं थी!
ये आलम देख कर तू ने भी आँखें फेर लीं वर्ना,कोई गर्दिश नहीं थी गर्दिश-ए-अय्याम से पहले| क़तील शिफ़ाई
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तड़पती हैं तमन्नाएँ!
तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले,लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-नाकाम से पहले| क़तील शिफ़ाई