Category: Uncategorized
-
हैरानी नहीं जाती!
कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा,मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
घोड़ों का अर्जीनामा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। प्रेम जी बहुत डूबकर अपने गहन संवेदन भरे गीत प्रस्तुत करते थे, मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनके मुख से कुछ गीत सुनने का अवसर मिला। लीजिए आज प्रस्तुत…
-
मुद्दत के बा’द ‘नूर’ !
मुद्दत के बा’द ‘नूर’ हँसी लब पे आई है,वो अपना हम-ख़याल बना ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
-
तूफ़ाँ के बा’द मैं भी!
तूफ़ाँ के बा’द मैं भी बहुत टूट सा गया,दरिया फिर अपने रुख़ पे बहा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
-
झोंका हवा का आया!
धरती का ये सफ़र मिरा जिस दिन हुआ तमाम,झोंका हवा का आया उड़ा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
-
बस तेरा प्यार था जो!
आवागमन की क़ैद से क्या छूटता कभी,बस तेरा प्यार था जो छुड़ा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
-
कोई चुरा ले गया मुझे!
इक जान-दार लाश समझिए मिरा वजूद,अब क्या धरा है कोई चुरा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर
-
हो वापसी अगर!
हो वापसी अगर तो इन्हें रास्तों से हो,जिन रास्तों से प्यार तिरा ले गया मुझे। कृष्ण बिहारी नूर