Category: Uncategorized
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कुछ बात थी जो लब!
कुछ बात थी जो लब नहीं खुलते थे हमारे,तुम समझे थे गूँगों के ज़बानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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ये शेर है छुप कर कभी!
ये शेर है छुप कर कभी हमला नहीं करता,मैदानी इलाक़ों में मचानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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मैं ढूंढता हूँ उनको!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में फिल्म- ठोकर के लिए मुकेश जी का गाया ये मधुर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे लिख थ साजन देहलवी जी ने और संगीत था श्यामजी घनश्याम जी का- मैं ढूंढता हूँ उनको रातों को खयालों में! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *******
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रद क्यूँ तिरी यादों की!
इन पर किसी मौसम का असर क्यूँ नहीं होता,रद क्यूँ तिरी यादों की उड़ानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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उजास!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। कुंवर नारायण जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की यह कविता– तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थेजब दुनिया मेंपहले प्यार का जन्म…
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अब कोई ग़ज़ल-चेहरा!
अब कोई ग़ज़ल-चेहरा दिखाई नहीं देता,अब शहर में अबरू की कमानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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क्या मरते हुए लोग!
क्या मरते हुए लोग ये इंसान नहीं हैं,क्या हँसते हुए फूलों में जानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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ख़ुश्बू का ये झोंका!
ख़ुश्बू का ये झोंका अभी आया है उधर से,किस ने कहा सहरा में अज़ानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना
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गदहा कहे कुम्हार से!
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से अभी प्रस्तुत है काका हाथरसी जी की एक और हास्य कविता- गदहा कहे कुम्हार से, तू क्या पीटे मोय! आशा है आपको यह पसंद आएगी,धन्यवाद। *******
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सहरा में चराग़ों की!
ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं,सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना