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बस्ती तेरी, सहरा तेरा!
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा। इब्ने इंशा
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हर शख़्स दीवाना तेरा!
इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा। इब्ने इंशा
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मंज़ूर था परदा तेरा!
हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा। इब्ने इंशा
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शब भर रहा चर्चा तेरा!
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा। इब्ने इंशा
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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी
एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया…
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मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं!
इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है, इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं। जावेद अख़्तर
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सारी भोली बातें रहती थीं!
इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं, इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं। जावेद अख़्तर
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पलकें बोझल रहती थीं!
इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं, इक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं। जावेद अख़्तर
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सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं!
इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं, इक वो दिन जब ‘आओ खेलें’ सारी गलियाँ कहती थीं| जावेद अख़्तर