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हवा का पता न था!
पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था। मुमताज़ राशिद
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उधर रास्ता न था!
पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था। मुमताज़ राशिद
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कौन थकान हरे जीवन की?
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक के माध्याम से हिन्दी में नई कविता का युग प्रारंभ हुआ था, इसमें संकलित कवियों के संबंध मे अज्ञेय जी ने लिखा था कि वे एक दूसरे से और एक दूसरे के कुत्तों से भी नफरत करते हैं, परंतु वे सभी कविता के नए युग के प्रतिनिधि हैं| तारसप्तक के…
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मैं पल दो पल का शायर हूँ!
मुझसे पहले कितने शायर, आए और आकर चले गए,कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए,क्यों कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे, मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे| मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है|पल दो पल मेरी हस्ती है, पल…
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नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले!
कल और आएंगे नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले,मुझसे बहते कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले| साहिर लुधियानवी
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मिल जाना क्या, न मिलना क्या!
उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्याख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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इक पीर पली मीलों तक!
आज एक बार फिर मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति और श्रेष्ठ रचनाकार थे| उनसे मिलने और उनका कविता पाठ सुनने का अनुभव स्मरणीय होता था| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की…