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आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ!
कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ, कुछ को लेकिन आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ| राजेश रेड्डी
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नामांकन!
आज फिर से मैं हमारे राष्ट्रकवि के रूप में सम्मान पाने वाले स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी ने सामान्यतः लंबी लंबी कविताएं और काव्य लिखे हैं|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की प्रेम पर लिखी यह छोटी परंतु असरदार रचना – सिंधुतट…
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राह के पत्थर तो हटाते जाते!
हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे, कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते| राहत इन्दौरी
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हँसते हैं मुझे देख के आते जाते!
मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद, लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते| राहत इन्दौरी
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मिरी प्यास बुझाते जाते!
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था, तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते| राहत इन्दौरी
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नए फूल खिलाते जाते!
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वर्ना, हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते| राहत इन्दौरी
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कोई ज़ख़्म लगाते जाते!
अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके, जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते| राहत इन्दौरी
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तिरे शहर में आते जाते!
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है ,उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते| राहत इन्दौरी
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मिरी जान लुटाते जाते
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते, जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते | राहत इन्दौरी
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देशगान!
एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेसगवार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में भी शामिल थे| यह रचना स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के कविता संकलन ‘खूँटियों’ पर टंगे लोग’ से ली गई…