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आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है!
दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है, थका थका मेरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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झर गये पात!
लंबे समय के बाद आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी ने अत्यंत गरीबी की स्थिति से अपना जीवन प्रारंभ किया था और अपने परिश्रम के बल पर वे एक सांसद बने और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी बने| मैंने दिल्ली में रहते…
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गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,गालियां खा के बे मज़ा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब
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भूल गलती- मुक्तिबोध
आज गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी एक क्रांतिकारी कवि थे, अपने समय से आगे की कविताएं लिखी थीं उन्होंने| लीजिए आज प्रस्तुत है गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता जो उनके संकलन ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ में शामिल थी – भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर…