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ज़ेहनों के वीराने लोग!
हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं, हमको दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग| राही मासूम रज़ा
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आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!
फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई, फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग| राही मासूम रज़ा
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हँसते हैं जाने पहचाने लोग!
कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है, आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग| राही मासूम रज़ा
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हमको आते हैं समझाने लोग!
यादों से बचना मुश्किल है उनको कैसे समझाएँ, हिज्र के इस सहरा तक हमको आते हैं समझाने लोग| राही मासूम रज़ा
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रोज़ कहें अफ़्साने लोग!
हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग, उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग| राही मासूम रज़ा
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अन्वेषण!
आज फिर से मैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और स्वाधीनता सेनानी भी थे| उनकी कुछ कविताओं का प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है| जैसे- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए’ अथवा ‘मैं…
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हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!
अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही, हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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ये दर्द जागता क्यूँ है!
कहानियों की गुज़रगाह पर भी नींद नहीं, ये रात कैसी है ये दर्द जागता क्यूँ है | राही मासूम रज़ा
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जीने का हौसला क्यूँ है!
जो दूर दूर नहीं कोई दिल की राहों पर, तो इस मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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इतना फ़ासला क्यूँ है!
सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से, मेरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा