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क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे!
इन चिराग़ों में तेल ही कम था,क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे| जावेद अख़्तर
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कतारों को वो पानी दे गया!
ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उसने इतना तो किया,मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया| जावेद अख़्तर
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कश्ती बादबानी दे गया!
सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई,और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया| जावेद अख़्तर
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बरा-ए-मेहरबानी दे गया!
उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी,ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया| जावेद अख़्तर
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ऐसी कहानी दे गया!
जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया,उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया| जावेद अख़्तर
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ऐसा क्या पाप किया था मैंने!
एक बार फिर से मैं आज अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नवगीत का नया संस्कार रंजक जी के गीतों में बखूबी प्रदर्शित होता है, वे कितनी खूबसूरती से जीवन की विसंगतियों को चित्रित करते हैं, मैंने पहले भी उनके अनेक नवगीत शेयर किए हैं!…