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झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ!
अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ, अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था| क़तील शिफ़ाई
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किसे दुनिया ने पहनाया न था!
वो पयम्बर हो कि आशिक़ क़त्ल-गाह-ए-शौक़ में, ताज काँटों का किसे दुनिया ने पहनाया न था| क़तील शिफ़ाई
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और तो कोई भी सरमाया न था!
हो गए क़ल्लाश जब से आस की दौलत लुटी, पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था| क़तील शिफ़ाई
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कोई हम-साया न था!
ख़ूब रोए छुप के घर की चार-दीवारी में हम, हाल-ए-दिल कहने के क़ाबिल कोई हम-साया न था| क़तील शिफ़ाई
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इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था!
उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल, ज़िंदगी में इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था| क़तील शिफ़ाई
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तुझे क्या हमने समझाया न था!
क्या मिला आख़िर तुझे सायों के पीछे भाग कर, ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे क्या हमने समझाया न था| क़तील शिफ़ाई
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यूँ तो पहले हमको तरसाया न था!
सुर्ख़ आहन पर टपकती बूँद है अब हर ख़ुशी, ज़िंदगी ने यूँ तो पहले हमको तरसाया न था| क़तील शिफ़ाई
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छाए थे बादल औ कहीं साया न था!
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था, इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था| क़तील शिफ़ाई
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तस्वीर अधूरी रहनी थी!
आज एक पुरानी पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ| हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते…
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तुमने मुझे बर्बाद किया!
मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया| जोश मलीहाबादी