इतनी बड़ी भीड़ में केवल!  

आज एक बार फिर मैं अपने समय में काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो अधूरा ही उपलब्ध हो पाया है|

निर्धन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का यह गीत –

 इतनी बड़ी भीड़ में केवल था मेरा ही कण्ठ अकेला
तुमने स्वर दे दिया गीत को बहुत बड़ा अहसान तुम्हारा।

जब जब प्यास बढ़ी प्राणों की
तब-तब मैंने खुलकर गाया
दर्द भरी वीणा को सुनकर
कोई मेरे पास न आया
दिन -दिन बढ़ती गई उदासी, ज्यों मरुस्थल में हिरनी प्यासी
तुम उतने ही दूर हो गए, मैंने जितनी बार पुकारा।

आँसू अक्षर बने एक दिन
गढ़ी गई पीड़ा की भाषा
अपना यदि कह दिया किसी ने
और बढ़ी जीने की आशा
बनी गन्ध फूलों की वाणी, मधुर हो गई प्रेम-कहानी
तब से मन- दर्पन में आकर ठहर गया प्रतिबिम्ब तुम्हारा।।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                               ********  

2 responses to “इतनी बड़ी भीड़ में केवल!  ”

  1. नमस्कार 🙏

    Liked by 1 person

    1. नमस्कार जी

      Like

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply