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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Oct 2022

    चिमटा फुकनी जैसी माँ!

    बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ, याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ| निदा फ़ाज़ली

  • 3rd Oct 2022

    नेता जी लगे मुस्कुराने!

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जिनको वैसे तो हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में जाना जाता है परंतु उन्होंने सब प्रकार की कविताएं लिखी हैं और बहुत सुंदर कविताएं लिखी हैं| लीजिए, आज मैं श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता शेयर कर…

  • 2nd Oct 2022

    सायों को गले लगा रहा हूँ!

    आया न ‘क़तील’ दोस्त कोई, सायों को गले लगा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    दर अपना ही खटखटा रहा हूँ!

    मुमकिन है जवाब दे उदासी, दर अपना ही खटखटा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ!

    है शहर में क़हत पत्थरों का, जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ!

    दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया, प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ!

    अहबाब को दे रहा हूँ धोखा, चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    आईना उसे दिखा रहा हूँ!

    महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना, आईना उसे दिखा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    सूरज से बदन छुपा रहा हूँ!

    सीने में मिरे है मोम का दिल, सूरज से बदन छुपा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    शीशे के महल बना रहा हूँ!

    हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ, शीशे के महल बना रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

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