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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Apr 2023

    मेरा घर बताता है!

    न कोई ओहदा न डिग्री न नाम की तख़्ती, मैं रह रहा हूँ यहाँ मेरा घर बताता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    मसअला उठाता है!

    उठाए जाएँ जहाँ हाथ ऐसे जलसे में, वही बुरा जो कोई मसअला उठाता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    क़िस्से सुनाए जाता है!

    कहाँ पहुँच गई दुनिया उसे पता ही नहीं, जो अब भी माज़ी के क़िस्से सुनाए जाता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    आँसू बहुत रुलाता है!

    बिछड़ते वक़्त किसी आँख में जो आता है, तमाम उम्र वो आँसू बहुत रुलाता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    शर्तें बहुत लगाता है!

    वो इस तरह भी मिरी अहमियत घटाता है, कि मुझसे मिलने में शर्तें बहुत लगाता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    समुंदर पे रहम आता है

    मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है, इसीलिए तो समुंदर पे रहम आता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Apr 2023

    शब्दों की पुकार!

    लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक रचना| जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है कि आम जनता के बीच दुष्यंत जी को आपातकाल में लिखी गईं उनकी विरोध का स्वर गुंजाने वाली ग़ज़लों के कारण मिली थी लेकिन वे हर दृष्टि से…

  • 5th Apr 2023

    करवट बदलते रहे!

    लिपट कर चराग़ों से वो सो गए, जो फूलों पे करवट बदलते रहे|      बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    घर थे बदलते रहे!

    मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी, किराए के घर थे बदलते रहे| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    जो रुख़ बदलते रहे!

    सुना है उन्हें भी हवा लग गई, हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे| बशीर बद्र

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