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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Apr 2023

    शो’लों पे जलते रहे!

    कोई फूल सा हाथ काँधे पे था, मिरे पाँव शो’लों पे जलते रहे| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    रास्तों में उजाला रहा!

    मिरे रास्तों में उजाला रहा, दिए उसकी आँखों में जलते रहे| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    रस्ते बदलते रहे!

    मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे, मुक़द्दर में चलना था चलते रहे| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    लब पे तेरा ही नाम है!

    मिरे फ़िक्र-ओ-फ़न तिरी अंजुमन न उरूज था न ज़वाल है, मिरे लब पे तेरा ही नाम था मिरे लब पे तेरा ही नाम है| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    रौशनी का इमाम है!

    मैं ये मानता हूँ मिरे दिए तिरी आँधियों ने बुझा दिए, मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    मेरा सज्दा हराम है!

    यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें, तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    किसी का ग़ुलाम है!

    बड़े शौक़ से मिरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी, ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    वही बुतों का निज़ाम है!

    वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है, ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है| बशीर बद्र

  • 5th Apr 2023

    वाणी-विहार

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले प्रतिष्ठित कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| आज की इस रचना में मिश्र जी ने कविता के व्यवसायीकरण की ओर संकेत किया है| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…

  • 4th Apr 2023

    लौट चलें अब अपने घर

    शब भर तो आवारा फिरे, लौट चलें अब अपने घर|     जाँ निसार अख़्तर

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