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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Oct 2022

    वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू!

    वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू, गाह गुल गाह रात-रानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Oct 2022

    या तिरा शोला-ए-जवानी है!

    शोला-ए-दिल है ये कि शोला-साज़, या तिरा शोला-ए-जवानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Oct 2022

    उसने अपनी भी बात मानी है!

    वो भला मेरी बात क्या माने, उसने अपनी भी बात मानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Oct 2022

    मेहरबानी है मेहरबानी है!

    बे-नियाज़ाना सुन लिया ग़म-ए-दिल, मेहरबानी है मेहरबानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Oct 2022

    ज़िंदगी दर्द की कहानी !

    ज़िंदगी दर्द की कहानी है, चश्म-ए-अंजुम में भी तो पानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 15th Oct 2022

    शक्ति या सौन्दर्य!

    आज एक बार फिर मैं देश के राष्ट्रकवि और हिन्दी के एक श्रेष्ठतम कवियों में से एक, स्वर्गीय रामधारी सिंह “दिनकर” जी की एक ओजस्वी रचना शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी का अपना नाम ही सूर्य के तेज को प्रकट करता है, उनके बारे में कुछ कहना सूर्य को दिया दिखाना होगा| लीजिए, प्रस्तुत…

  • 14th Oct 2022

    वजूद उसका चमकता है बहुत!

    तीरगी हो तो वजूद उसका चमकता है बहुत, ढूँढ तो लूँगा उसे ‘नूर’ मगर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Oct 2022

    बहुत अपने से डर शाम के बाद!

    यही मिलने का समय भी है बिछड़ने का भी, मुझको लगता है बहुत अपने से डर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Oct 2022

    नहीं अपनी ख़बर शाम के बाद!

    मेरे बारे में कोई कुछ भी कहे सब मंज़ूर, मुझको रहती ही नहीं अपनी ख़बर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Oct 2022

    कोई शजर शाम के बाद!

    तुम न कर पाओगे अंदाज़ा तबाही का मिरी, तुमने देखा ही नहीं कोई शजर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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