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बादल है कि साया है कि तुम हो!
ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है, ये धुँध है बादल है कि साया है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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मनुष्य पर कविताएं- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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ये कोई तुम सा है कि तुम हो!
जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो, ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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आना जाना नहीं कि तुझसे कहें!
अब तो अपना भी उस गली में ‘फ़राज़’, आना जाना नहीं कि तुझसे कहें| अहमद फ़राज़
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दुख फ़साना नहीं कि तुझसे कहें!
दुख फ़साना नहीं कि तुझसे कहें, दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें| अहमद फ़राज़