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बा-शौकत-ए-शाहाना हम!
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव, आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम| अली सरदार जाफ़री
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लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम!
क्या बला जब्र-ए-असीरी है कि आज़ादी में भी, दोश पर अपने लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम| अली सरदार जाफ़री
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गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम!
ख़ून-ए-दिल से चश्म-ए-तर तक चश्म-ए-तर से ता-ब-ख़ाक, कर गए आख़िर गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम| अली सरदार जाफ़री
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कुमार गंधर्व का गायन सुनते हुए!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में बात भी की है| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने विख्यात शास्त्रीय…