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तबीअ’त का समझ बैठे थे हम!
भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती, उसको भी अपनी तबीअ’त का समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम!
बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द, तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम!
क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँकर खुला, हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम!
होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी, इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तुझे अपना समझ बैठे थे हम!
रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए, वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम!
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम, उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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प्रेयसी!
आज हिन्दी कविता के शिखर पुरुष स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की प्रेम से, सौन्दर्य से जुड़ी एक लंबी कविता का कुछ अंश मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ| महाप्राण निराला जी की अन्य कविताओं की तरह यह कविता भी लाज़वाब है| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता – घेर…
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पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया!
मंज़िल है उस महक की कहाँ किस चमन में है, उसका पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी
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वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया!
कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए, तूने वो वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी
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शहर-ए-यार में आने नहीं दिया!
उस सम्त मुझको यार ने जाने नहीं दिया, इक और शहर-ए-यार में आने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी