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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Nov 2022

    तबीअ’त का समझ बैठे थे हम!

    भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती, उसको भी अपनी तबीअ’त का समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम!

    बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द, तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम!

    क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँकर खुला, हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम!

    होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी, इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    तुझे अपना समझ बैठे थे हम!

    रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए, वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम!

    कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम, उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Nov 2022

    प्रेयसी!

    आज हिन्दी कविता के शिखर पुरुष स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की प्रेम से, सौन्दर्य से जुड़ी एक लंबी कविता का कुछ अंश मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ| महाप्राण निराला जी की अन्य कविताओं की तरह यह कविता भी लाज़वाब है| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता – घेर…

  • 4th Nov 2022

    पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया!

    मंज़िल है उस महक की कहाँ किस चमन में है, उसका पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Nov 2022

    वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया!

    कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए, तूने वो वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Nov 2022

    शहर-ए-यार में आने नहीं दिया!

    उस सम्त मुझको यार ने जाने नहीं दिया, इक और शहर-ए-यार में आने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

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