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बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने!
हुआ है हुक्म कि ‘कैफ़ी’ को संगसार करो, मसीह बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने| कैफ़ी आज़मी
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आज तलब कर लिया है सहरा ने!
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना, मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने| कैफ़ी आज़मी
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तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने!
जहाँ से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा, वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने| कैफ़ी आज़मी
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प्यास के फूँके हुए ये वीराने!
यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो, हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने| कैफ़ी आज़मी
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झरना!
आज हिन्दी कविता में छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ रहे स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं| ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि उनकी कालजयी रचनाएं हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – तिरस्कार कालिमा कलित हैं,अविश्वास-सी पिच्छल हैं।कौन…
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क्या क्या समझ बैठे थे हम!
हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ ‘फ़िराक़’, मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम!
रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला, ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी