-
देखी थी कोई बरसात कहाँ!
मेरी आबला-पाई* उनमें याद अक्सर की जाती है, काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ|*पैर के छाले राही मासूम रज़ा
-
फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ!
ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ, हमने तो सहरा में बसर की तुमने गुज़ारी रात कहाँ| राही मासूम रज़ा
-
दीवाने हैं सहरा से चले आए हैं!
इस बयाबान-ए-दर-ओ-बाम में क्या रक्खा है, हम ही दीवाने हैं सहरा से चले आए हैं| राही मासूम रज़ा
-
जो अक्सर हमें याद आए हैं!
हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें, हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं| राही मासूम रज़ा
-
किसी शख़्स के हाथ आए हैं!
याद जिस चीज़ को कहते हैं वो परछाईं है, और साए भी किसी शख़्स के हाथ आए हैं| राही मासूम रज़ा
-
ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को!
ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को, उसके गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं| राही मासूम रज़ा
-
ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल!
हम थके-हारे हैं ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल, कहीं साया जो नज़र आया है घबराए हैं| राही मासूम रज़ा
-
ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं!
प्यास बुनियाद है जीने की बुझा लें कैसे, हमने ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं| राही मासूम रज़ा
-
यही एक ख़बर लाए हैं!
लोग यक-रंगी-ए-वहशत से भी उकताए हैं, हम बयाबाँ से यही एक ख़बर लाए हैं| राही मासूम रज़ा
-
सुरसा सा मुंह फाड़ रही है!
आज मैं मेरे लिए गुरु-तुल्य रहे हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत– गलियों मेंचौराहों परघर-घर में मचे तुफ़ैल-सी।बाल बिखेरे…