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लोग कुछ डूबते नजर आए!
जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आएचांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए| गुलज़ार
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आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!
चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में, थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ!
आँखों के पोछने से लगा आग का पता, यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में!
काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में, बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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आँसुओं के मरासिम पुराने हैं!
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं, मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ!
पलकों के ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ, कितनी उँडेलीं आँखें प बुझता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ!
आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ, उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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मुझे क़दम-क़दम पर!
स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी अपनी तरह के अनूठे कवि थे| नई कविता आंदोलन से जुड़े कवियों में उनकी अलग पहचान थी| उन्होंने काफी लंबी-लंबी कविताएं लिखी हैं| आज जो कविता शेयर कर रहा हूँ, वह उनमें से अपेक्षाकृत कम लंबी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता– मुझे…