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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Dec 2022

    लोग कुछ डूबते नजर आए!

    जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आएचांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    जैसे हम को पुकारता है कोई!

    देर से गूँजते हैं सन्नाटे जैसे हम को पुकारता है कोई । गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!

    चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में, थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ!

    आँखों के पोछने से लगा आग का पता, यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में!

    काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में, बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    अब उठता नहीं धुआँ!

    चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई, कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    आँसुओं के मरासिम पुराने हैं!

    आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं, मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ!

    पलकों के ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ, कितनी उँडेलीं आँखें प बुझता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ!

    आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ, उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ| गुलज़ार

  • 4th Dec 2022

    मुझे क़दम-क़दम पर!

    स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी अपनी तरह के अनूठे कवि थे| नई कविता आंदोलन से जुड़े कवियों में उनकी अलग पहचान थी| उन्होंने काफी लंबी-लंबी कविताएं लिखी हैं| आज जो कविता शेयर कर रहा हूँ, वह उनमें से अपेक्षाकृत कम लंबी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता– मुझे…

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