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हुईं मंज़िलें तमाम!
बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम, बहलाएँ तुझ से छुट के तबीअ’त कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ!
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ, उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आह! वेदना मिली विदाई!
एक बार फिर मैं आज छायावाद युग के स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हिन्दी कविता के लिए प्रसाद जी का योगदान अमूल्य है, विशेष रूप से उनके महाकाव्य- ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – आह! वेदना मिली विदाईमैंने भ्रमवश…
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अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है!
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं, अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब
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शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है!
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है, निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब
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काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है!
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ, काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब