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आप को रुस्वा किया न जाए!
अच्छा है उनसे कोई तक़ाज़ा किया न जाए, अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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शब्दों से परे!
आज फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मन में पलती पीड़ाओं को मिश्र जी ने इस गीत में सुंदर अभिव्यक्ति दी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – शब्दों से परे-परेमन के घन भरे-भरे वर्षा…
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सोया भी नहीं था कि जगाने निकले!
वो सितम-केश बहर-ए-हाल सितम-केश रहे, दर्द सोया भी नहीं था कि जगाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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यादों के ख़ज़ाने निकले!
जिन किताबों पे सलीक़े से जमी वक़्त की गर्द, उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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यहाँ कितने बहाने निकले!
कारोबार-ए-रसन-ओ-दार की तशहीर हुई, सरफ़रोशी के यहाँ कितने बहाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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सनद हम जो दिखाने निकले!
अपने घर संग-ए-मलामत की हुई है बारिश, बे-गुनाही की सनद हम जो दिखाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले!
देखना ये है ठहरता है कहाँ जोश-ए-जुनूँ, सर-फिरे शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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उन्हें भी तो चुराने निकले!
ख़्वाब तो ख़्वाब थे आँखों में कहाँ रुक जाते, वो दबे पाँव उन्हें भी तो चुराने निकले| रज़ा अमरोहवी
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कई और फ़साने निकले!
दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले, इक फ़साने से कई और फ़साने निकले| रज़ा अमरोहवी
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डूब गया दिन
लंबे समय के बाद आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत मुझे अत्यंत प्रिय है- ‘यात्रा के बाद भी पथ साथ रहते हैं’| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत – डूब…