-
कब तक याद न आओगे!
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे, कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
दिल में सितारे उतरने लगते हैं!
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं!
वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी*, फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं|Speaking in style फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
आँसू उभरने लगते हैं!
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
तुम्हें याद करने लगते हैं!
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
कटती फसलों के साथ!
अपने समय में हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| ठाकुरप्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – कटती फसलों के साथ कट गया सन्नाटाबजती फसलों…
-
दाता हो तो ऐसा हो!
हमने यही माँगा था उसने यही बख़्शा है, बंदा हो तो ऐसा हो दाता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
-
चुभता हो तो ऐसा हो!
इस दर्द में क्या क्या है रुस्वाई भी लज़्ज़त भी, काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
-
अपना हो तो ऐसा हो!
वो भी रहा बेगाना हमने भी न पहचाना, हाँ ऐ दिल-ए-दीवाना अपना हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा