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मंज़र बदल गया!
थी शाम ज़हर-ए-रंग में डूबी हुई खड़ी, फिर इक ज़रा सी देर में मंज़र बदल गया| मुनीर नियाज़ी
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दफ़ीने देख लेता हूँ!
खड़ा हूँ यूँ किसी ख़ाली क़िले के सेहन-ए-वीराँ में, कि जैसे मैं ज़मीनों में दफ़ीने* देख लेता हूँ| *गड़े , दफनाए हुए, खजाने मुनीर नियाज़ी
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छींटे देख लेता हूँ!
छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी, गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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चुप बैठे देख लेता हूँ!
कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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चुप बैठे देख लेता हूँ!
कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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ये तमाशे देख लेता हूँ!
थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ, मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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तोड़ो!
अपने समय के एक प्रमुख कवि और दिनमान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता – तोड़ो तोड़ो तोड़ोये पत्थर ये चट्टानेंये झूठे बंधन टूटेंतो धरती का हम जानेंसुनते हैं मिट्टी में…
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कलाम तक न पहुँचे!
वही इक ख़मोश नग़्मा है ‘शकील’ जान-ए-हस्ती, जो ज़बान पर न आए जो कलाम तक न पहुँचे| शकील बदायूनी