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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Mar 2023

    मंज़र बदल गया!

    थी शाम ज़हर-ए-रंग में डूबी हुई खड़ी, फिर इक ज़रा सी देर में मंज़र बदल गया| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    और चाँद ढल गया!

    सोया हुआ था शहर किसी साँप की तरह, मैं देखता ही रह गया और चाँद ढल गया| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    जंगल दहल गया!

    इक तेज़ तीर था कि लगा और निकल गया, मारी जो चीख़ रेल ने जंगल दहल गया| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    दफ़ीने देख लेता हूँ!

    खड़ा हूँ यूँ किसी ख़ाली क़िले के सेहन-ए-वीराँ में, कि जैसे मैं ज़मीनों में दफ़ीने* देख लेता हूँ| *गड़े , दफनाए हुए, खजाने मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    छींटे देख लेता हूँ!

    छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी, गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    चुप बैठे देख लेता हूँ!

    कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    चुप बैठे देख लेता हूँ!

    कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    ये तमाशे देख लेता हूँ!

    थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ, मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Mar 2023

    तोड़ो!

    अपने समय के एक प्रमुख कवि और दिनमान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|   लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता – तोड़ो तोड़ो तोड़ोये पत्‍थर ये चट्टानेंये झूठे बंधन टूटेंतो धरती का हम जानेंसुनते हैं मिट्टी में…

  • 26th Mar 2023

    कलाम तक न पहुँचे!

    वही इक ख़मोश नग़्मा है ‘शकील’ जान-ए-हस्ती, जो ज़बान पर न आए जो कलाम तक न पहुँचे|      शकील बदायूनी

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