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खोकर जी लिया मैंने!
उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है, कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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सहारे जी लिया मैंने!
अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में, कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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ये भी पी लिया मैंने!
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने, ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी
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कविता!
आज एक बार फिर से मैं अपनी किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय सुदामा प्रसाद पांडे ‘धूमिल’ जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| धूमिल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धूमिल जी की यह कविता, जो कविता के बारे में ही है – उसे मालूम है…