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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Apr 2023

    शक्ल तो दिखा गया!

    दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया, मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    चलें दिन जा रहा है!

    किसे ढूँढोगे इन गलियों में ‘नासिर’, चलो अब घर चलें दिन जा रहा है| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    रात से याद आ रहा है!

    वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का, जो पिछली रात से याद आ रहा है| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    शहर जो प्यासा रहा है!

    सुना है रात भर बरसा है बादल, मगर वो शहर जो प्यासा रहा है| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    आँखों का आलम!

    अजब है रात से आँखों का आलम, ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    रात भर जलता रहा है!

    तिरे आने का धोका सा रहा है, दिया सा रात भर जलता रहा है| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    ग्रहण!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – शहरी विज्ञापन ने हमसे सब-कुछ छीन लिया । आंगन का मटमैला…

  • 1st Apr 2023

    सह सकूँ न कह पाऊँ!

    वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ, मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे|     मजरूह सुल्तानपुरी

  • 1st Apr 2023

    अजनबी हूँ महफ़िल में!

    मुआ‘फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में, कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 1st Apr 2023

    सुना रही है फ़साने!

    सबा भी लाई न कोई पयाम अपनों का, सुना रही है फ़साने इधर उधर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी

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