-
शक्ल तो दिखा गया!
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया, मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया| नासिर काज़मी
-
ग्रहण!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – शहरी विज्ञापन ने हमसे सब-कुछ छीन लिया । आंगन का मटमैला…
-
सह सकूँ न कह पाऊँ!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ, मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
-
अजनबी हूँ महफ़िल में!
मुआ‘फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में, कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी