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चमकता कोई तारा!
उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा, मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ अजीब लगता है!
ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस, कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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कोई रक़ीब लगता है!
हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा, न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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बद-नसीब लगता है!
जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार, वो शख़्स मुझको बहुत बद-नसीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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अजीब लगता है!
तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है, तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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सुबह बने हैं ओस!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत| कुमार शिव जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत – सुबह बने हैं ओसरात को बने सितारेमेरे होंठों पर जितनेस्पर्श…
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कहाँ गईं वो सोहबतें!
पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें, ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया| नासिर काज़मी
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मुझे भी सब्र आ गया!
जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए, तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया| नासिर काज़मी
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लुत्फ़ भी चला गया!
वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई, वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया| नासिर काज़मी