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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Apr 2023

    नदी में कितने भँवर!

    ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर, एक नदी में कितने भँवर| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    चमकता कोई तारा!

    उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा, मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    कुछ अजीब लगता है!

    ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस, कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    कोई रक़ीब लगता है!

    हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा, न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    बद-नसीब लगता है!

    जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार, वो शख़्स मुझको बहुत बद-नसीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    अजीब लगता है!

    तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है, तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 3rd Apr 2023

    सुबह बने हैं ओस!

    लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय  कुमार शिव जी का एक नवगीत| कुमार शिव जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत – सुबह बने हैं ओसरात को बने सितारेमेरे होंठों पर जितनेस्पर्श…

  • 2nd Apr 2023

    कहाँ गईं वो सोहबतें!

    पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें, ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    मुझे भी सब्र आ गया!

    जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए, तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया| नासिर काज़मी

  • 2nd Apr 2023

    लुत्फ़ भी चला गया!

    वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई, वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया| नासिर काज़मी

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