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शाख़ फल तो सकती है
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बात खल तो सकती है!
जो तूने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा, हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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पिघल तो सकती है!
सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आत्मकथ्य!
आज एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, प्रसाद जी की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,मुरझाकर गिर रहीं…
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सँभल तो सकती है
तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बदल तो सकती है!
अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद, अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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धूप ढल तो सकती है!
कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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शादमाँ हो जाएँ!
अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ, निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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खा के ठोकरें लेकिन
उरूस-ए-दहर* चले खा के ठोकरें लेकिन, क़दम क़दम पे जवानी उबल तो सकती है| *Top of the world फ़िराक़ गोरखपुरी