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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Apr 2023

    शाख़ फल तो सकती है

    हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 20th Apr 2023

    बात खल तो सकती है!

    जो तूने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा, हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 20th Apr 2023

    पिघल तो सकती है!

    सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 20th Apr 2023

    आत्‍मकथ्‍य!

    आज एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, प्रसाद जी की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना  – मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,मुरझाकर गिर रहीं…

  • 19th Apr 2023

    सँभल तो सकती है

    तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 19th Apr 2023

    बदल तो सकती है!

    अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद, अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 19th Apr 2023

    धूप ढल तो सकती है!

    कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के, मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 19th Apr 2023

    शादमाँ हो जाएँ!

    अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ, निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 19th Apr 2023

    खा के ठोकरें लेकिन

    उरूस-ए-दहर* चले खा के ठोकरें लेकिन, क़दम क़दम पे जवानी उबल तो सकती है| *Top of the world फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 19th Apr 2023

    चुप सी लग गई वर्ना!

    तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना, कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

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