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जहाँ हैं फूल वहीं!
घरों के ताक़ों में गुल-दस्ते यूँ नहीं सजते, जहाँ हैं फूल वहीं आस-पास ख़ार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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ज़ेहन में बहार भी रख
ये ही लहू है शहादत ये ही लहू पानी, ख़िज़ाँ नसीब सही ज़ेहन में बहार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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यक़ीन चाँद पे!
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए‘तिबार भी रख, मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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ख़ार निकल गए!
मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें, बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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शबाब गर्मी-ए-बज़्म है
तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है, तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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जहाँ के तौर बदल गए!
वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं, दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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नग़्मा में आ गई!
वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई, वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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हैं सबसे मधुर वो गीत!
आज एक बार फिर से मैं भारतीय फिल्मों पर अपने गीतों के माध्यम से अमिट छाप छोड़ने वाले जनकवि स्वर्गीय शैलेंद्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| शैलेंद्र जी की बहुत सी रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी की यह रचना – हैं सबसे मधुर…
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शबों के राज़ मचल गए
वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर, उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए| मजरूह सुल्तानपुरी