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सहरा समझते हैं!
कहीं हों तेरे दीवाने ठहर जाएँ तो ज़िंदाँ है, जिधर को मुँह उठा कर चल पड़े सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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खटका समझते हैं!
यही ज़िद है तो ख़ैर आँखें उठाते हैं हम उस जानिब, मगर ऐ दिल हम इसमें जान का खटका समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उमीदों में भी उनकी!
उमीदों में भी उनकी एक शान-ए-बे-नियाज़ी है, हर आसानी को जो दुश्वार हो जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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शायद भेस बदला है!
कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है, तिरे दम भर के मिल जाने को हम भी क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दीवाना समझते हैं!
बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना समझते हैं, कि इस दुनिया को हम इक दूसरी दुनिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बताएँ क्या समझते हैं!
किसी बदमस्त को राज़-आश्ना सब का समझते हैं| निगाह-ए-यार तुझ को क्या बताएँ क्या समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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क्या समझते हैं!
तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं, समझ लो साँस लेना ख़ुद-कुशी करना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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लोग!
आज मैं हिन्दी नवगीत के पुरोधा स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी की यह रचना – सोनहँसी हँसते हैं लोग हँस-हँस कर डसते हैं लोग । रस की धारा झरती हैविष पिए हुए…
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पानी शराब कर दूँगा!
मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना, मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा| राहत इंदौरी
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महफ़िल की रौशनी हूँ
मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं, उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा| राहत इंदौरी